Monday, February 23, 2026

आईआईटी जोधपुर के शोधकर्ताओं ने खोजा मानव शरीर का ऐसा प्रोटीन

शिक्षा मंत्रालय//Azadi Ka Amrit Mahotsav//प्रविष्टि तिथि: 23 FEB 2026 at 5:45 PM by PIB Jaipur

ऐसा प्रोटीन जो खतरनाक बैक्टीरियल बायोफिल्म को रोक सकता है-शोध PNAS में प्रकाशित

महत्वपूर्ण खोज: शरीर में प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला प्रोटीन जिद्दी ई.कोलाई संक्रमण को रोक सकता है, बिना एंटीबायोटिक प्रतिरोध बढ़ाए


जयपुर: 23 फरवरी 2026: (PIB Jaipur//राजस्थान स्क्रीन डैस्क)::

Indian Institute of Technology Jodhpur (आईआईटी जोधपुर) के वैज्ञानिकों ने एक बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धि हासिल की है। उन्होंने पाया है कि मानव शरीर में स्वाभाविक रूप से मौजूद एक प्रोटीन बैक्टीरिया द्वारा बनने वाली खतरनाक और अत्यधिक प्रतिरोधक बायोफिल्म को बनने से रोक सकता है। बायोफिल्म लंबे समय तक चलने वाले संक्रमण और एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) का एक प्रमुख कारण है।

यह शोध विश्व की प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय पत्रिका Proceedings of the National Academy of Sciences (PNAS), अमेरिका में प्रकाशित हुआ है।

🔬 शोध लेख

H. Agarwal, H. Ben, A. Chaini, B. Gurnani, N. Mukherjee, A. Pal, A.K. Upadhyaya, S. Ghosh, D. Kumar Sasmal, & N. Jain (2026).

β2-microglobulin inhibits Escherichia coli biofilm formation via selectively blocking curli assembly. Proc. Natl. Acad. Sci. U.S.A. 123 (8) e2515986123.

🔗 https://doi.org/10.1073/pnas.2515986123

बायोफिल्म क्या होती है?

जब हम बैक्टीरिया के बारे में सोचते हैं, तो अक्सर हमें वे अकेले तैरते हुए कोशिकाओं की तरह दिखाई देते हैं। लेकिन वास्तव में कई बैक्टीरिया आपस में जुड़कर एक मजबूत परत बना लेते हैं, जिसे बायोफिल्म कहा जाता है।

यह बायोफिल्म एक तरह की सूक्ष्म “ढाल” होती है, जो प्रोटीन, शर्करा और डीएनए से मिलकर बनती है। यह बैक्टीरिया को बाहरी हमलों से बचाती है।

बायोफिल्म में मौजूद बैक्टीरिया सामान्य बैक्टीरिया की तुलना में 1,000 गुना अधिक एंटीबायोटिक प्रतिरोधी हो सकते हैं।

बायोफिल्म आमतौर पर इन जगहों पर पाई जाती है:

कैथेटर

कृत्रिम हृदय वाल्व

हड्डी के इम्प्लांट

पुराने और न भरने वाले घाव

ये लंबे समय तक चलने वाले संक्रमणों का कारण बनती हैं और वैश्विक स्तर पर एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस की समस्या को बढ़ाती हैं।

शोध में क्या नई खोज हुई?

Escherichia coli (ई.कोलाई) में बायोफिल्म बनने के लिए एक महत्वपूर्ण प्रोटीन होता है, जिसे कर्ली (Curli) कहा जाता है। कर्ली एक ढांचे (scaffold) की तरह काम करता है, जिससे बैक्टीरिया सतह पर चिपकते हैं और एक-दूसरे से जुड़ते हैं।

आईआईटी जोधपुर की टीम ने पाया कि मानव शरीर में मौजूद β2-माइक्रोग्लोब्यूलिन (β2m) नामक प्रोटीन इस प्रक्रिया को रोक सकता है।

यह प्रोटीन बैक्टीरिया को मारता नहीं है, बल्कि कर्ली के बनने की शुरुआती प्रक्रिया को ही रोक देता है। इससे बायोफिल्म बन ही नहीं पाती।

यह खोज क्यों महत्वपूर्ण है?

यह सीधे बैक्टीरिया को मारने के बजाय उनकी सुरक्षा ढाल को कमजोर करता है।

इससे बैक्टीरिया में प्रतिरोध (रेजिस्टेंस) विकसित होने की संभावना कम हो जाती है।

यह पारंपरिक एंटीबायोटिक से अलग और नया इलाज का रास्ता दिखाता है।

इसमें घाव भरने की क्षमता भी हो सकती है।

यह अध्ययन β2m की एक नई भूमिका को सामने लाता है, जो पहले केवल प्रतिरक्षा प्रणाली (इम्यून सिस्टम) से जुड़ा माना जाता था।

वैज्ञानिक की प्रतिक्रिया

इस शोध की प्रमुख वैज्ञानिक और संबंधित लेखक, डॉ. नेहा जैन, एसोसिएट प्रोफेसर, बायोसाइंस एवं बायोइंजीनियरिंग विभाग, आईआईटी जोधपुर ने कहा:

“बायोफिल्म लंबे समय तक चलने वाले संक्रमणों के इलाज में सबसे बड़ी चुनौती है, क्योंकि यह बैक्टीरिया को एंटीबायोटिक और हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली से बचाती है। हमारे अध्ययन से पता चला है कि β2-माइक्रोग्लोब्यूलिन, जो मानव शरीर में स्वाभाविक रूप से पाया जाता है, कर्ली के निर्माण को रोककर बायोफिल्म बनने से रोक सकता है। यह बैक्टीरिया को मारने के बजाय उनकी सुरक्षा संरचना को कमजोर करता है। इससे प्रतिरोध का खतरा कम होता है और शरीर की अपनी जैविक प्रणाली से प्रेरित नई चिकित्सा विकसित करने का रास्ता खुलता है।”

वैश्विक स्वास्थ्य के लिए नई दिशा

एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस आज दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य चुनौतियों में से एक है। पारंपरिक एंटीबायोटिक बैक्टीरिया को मारती हैं, लेकिन इससे समय के साथ प्रतिरोधी स्ट्रेन विकसित हो जाते हैं।

यह शोध एक समझदारी भरा विकल्प प्रस्तुत करता है:

बैक्टीरिया को मारने के बजाय उनकी सुरक्षा ढाल को तोड़कर उन्हें कमजोर किया जाए।

मानव शरीर में पहले से मौजूद अणुओं का उपयोग करके सुरक्षित और टिकाऊ उपचार विकसित करने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम है।

आईआईटी जोधपुर का यह अग्रणी शोध दिखाता है कि भारत में हो रहा अत्याधुनिक वैज्ञानिक कार्य वैश्विक स्वास्थ्य समस्याओं के समाधान में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है।

पूर्ण विवरण के लिए, PNAS में प्रकाशित अध्ययन पढ़ें 🔗https://doi.org/10.1073/pnas.2515986123

यह अध्ययन Dr. Neha Jain के नेतृत्व में Indian Institute of Technology Jodhpur में किया गया, जिसमें बायोफिजिक्स, माइक्रोबायोलॉजी, स्ट्रक्चरल बायोलॉजी, मॉलिक्यूलर बायोलॉजी तथा संक्रमण के पशु मॉडलों में विशेषज्ञता रखने वाले बहु-विषयी शोधकर्ताओं की टीम ने सहभागिता की।

इस सहयोगात्मक प्रयास में H. Agarwal, H. Ben, A. Chaini, B. Gurnani, N. Mukherjee, A. Pal, A.K. Upadhyaya, S. Ghosh, D. Kumar Sasmal तथा N. Jain शामिल रहे।

टीम ने उन्नत आणविक विश्लेषण, बायोफिल्म अध्ययन तथा यांत्रिक (मैकेनिस्टिक) जांच को समेकित करते हुए यह खोज की कि β2-माइक्रोग्लोब्युलिन किस प्रकार चयनात्मक रूप से Escherichia coli में करली (curli) असेंबली को अवरुद्ध करता है। उनका एकीकृत दृष्टिकोण — जो मूलभूत जीवविज्ञान से लेकर अनुप्रयुक्त (ट्रांसलेशनल) महत्व तक विस्तृत था — मानव प्रतिरक्षा प्रोटीन के इस पूर्व अज्ञात कार्य को उजागर करने में निर्णायक सिद्ध हुआ। यह अध्ययन वैश्विक स्वास्थ्य चुनौतियों, जैसे एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध, से निपटने में सहयोगात्मक एवं अंतर्विषयी शोध की शक्ति को दर्शाता है।

(रिलीज़ आईडी: 2231822)